बाड़मेर, 01 नवंबर 2025।
मरुस्थल की धरती बाड़मेर एक बार फिर से मनरेगा कार्यों के मामले में पूरे प्रदेश में अग्रणी बन गया है। जहां अन्य जिलों में मनरेगा कार्य सीमित दायरे में हैं, वहीं बाड़मेर का सालाना मनरेगा बजट अब एक हजार करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच चुका है। यह बजट राज्य के कई जिलों के संयुक्त बजट के बराबर है।
🌾 मनरेगा बना ग्रामीण आजीविका का सहारा
राजस्थान के पश्चिमी छोर पर बसे बाड़मेर जिले में 7 लाख से अधिक परिवारों की रोजी-रोटी आज भी मनरेगा पर निर्भर है। इनमें से लाखों परिवार ऐसे हैं, जिनका प्रमुख रोजगार और आमदनी का स्रोत मनरेगा ही है।
जिले की भौगोलिक परिस्थितियां कठिन हैं — मरुस्थलीय जलवायु, सूखा और सीमित कृषि संसाधनों के चलते यहां मनरेगा ग्रामीणों की “जीवनरेखा” बनी हुई है।
💧 सबसे ज्यादा खर्च टांकों के निर्माण पर
जिले में मनरेगा के तहत सबसे अधिक राशि पानी संग्रहण टांकों के निर्माण पर खर्च की जा रही है। अब तक बाड़मेर जिले में तीन लाख से ज्यादा टांके बनाए जा चुके हैं। ये टांके गांव-गांव में जलसंकट का समाधान करने के साथ-साथ ग्रामीणों के लिए रोजगार के अवसर भी प्रदान कर रहे हैं।
साल 2024-25 में बाड़मेर जिले में 1019.37 करोड़ रुपये के कार्य स्वीकृत हुए हैं, जिनमें टांके निर्माण, चारागाह विकास, मिट्टी कार्य, सड़कों का निर्माण और जल संरक्षण के अन्य कार्य प्रमुख हैं।
📊 पिछले पांच वर्षों का बजट रिकॉर्ड
| वर्ष | मनरेगा बजट (करोड़ रुपये में) |
|---|---|
| 2021-22 | 1200 |
| 2022-23 | 1109 |
| 2023-24 | 906 |
| 2024-25 | 1019 |
| 2025-26 (प्रस्तावित) | 1145 |
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि बाड़मेर लगातार राजस्थान के सबसे बड़े मनरेगा जिलों में गिना जा रहा है।
🚫 सरकार ने टांकों पर लगाई रोक, अब राज्य ने मांगी छूट
हाल ही में केंद्र सरकार की ओर से मनरेगा में टांकों के नए निर्माण पर रोक लगा दी गई थी। इसके चलते मरुस्थलीय जिलों में जल संरक्षण के कार्य रुक गए थे।
राज्य सरकार ने इस पर आपत्ति जताते हुए केंद्र को पत्र भेजा है और आग्रह किया है कि बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर, बीकानेर और जालोर जैसे सूखा प्रभावित जिलों के लिए इस रोक को हटाया जाए।
राज्य सरकार का कहना है कि इन जिलों में टांके सिर्फ पानी संग्रहण का साधन नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं।
🗣️ मुख्यमंत्री का बयान
मुख्यमंत्री ने कहा —
“मरुस्थल के लोगों के लिए पानी जीवन से भी ज्यादा जरूरी है। यहां के ग्रामीणों की पीने के पानी और पशुधन की जरूरतें टांकों से पूरी होती हैं। ऐसे में इन पर रोक लगाना न्यायोचित नहीं है। राज्य सरकार केंद्र से पुनः छूट दिलाने का पूरा प्रयास कर रही है।”
👩🌾 80 फीसदी परिवार मनरेगा से जुड़े
बाड़मेर जिले के करीब 80 प्रतिशत परिवार किसी न किसी रूप में मनरेगा कार्यों से जुड़े हुए हैं।
इस योजना से ग्रामीणों को सालभर रोजगार, महिलाओं को सशक्तिकरण और जल संरक्षण के साथ पर्यावरणीय सुधार का अवसर मिला है।
🏗️ अब तक का कामकाज और लक्ष्य
- अब तक बनाए गए टांके : 3 लाख+
- सालाना खर्च : ₹1000 करोड़ से अधिक
- परिवार लाभार्थी : 7 लाख+
- 2025-26 का लक्ष्य : ₹1145 करोड़ का कार्य
🔎 निष्कर्ष
बाड़मेर का मनरेगा मॉडल अब राजस्थान में उदाहरण बन चुका है। जहां अन्य जिलों में काम घट रहा है, वहीं बाड़मेर में मनरेगा न सिर्फ रोजगार बल्कि जल संरक्षण और ग्रामीण विकास की दिशा में अहम योगदान दे रहा है।
अब सभी की नजरें इस पर हैं कि क्या केंद्र सरकार फिर से टांकों के निर्माण को मंजूरी देगी या नहीं।
